छतरपुर/पन्ना में केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित विस्थापितों का आंदोलन आज एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुका है। 12 दिनों तक चले पंचतत्व सत्याग्रह में आदिवासी भाई-बहनों, महिलाओं और बच्चों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अद्भुत साहस और एकजुटता दिखाई है। यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई है, जिसने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया है।
इसी संदर्भ में ओबीसी महासभा के संभागीय प्रभारी ग्याप्रसाद पटेल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि वे इस पूरे घटनाक्रम से बेहद व्यथित और चिंतित हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हाल ही में उनकी आंखों की सर्जरी हुई है, जिसके कारण वे शारीरिक रूप से आंदोलन स्थल पर उपस्थित नहीं हो सके। लेकिन वे लगातार आंदोलनकारियों के संपर्क में रहे हैं और फोन के माध्यम से हर स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
ग्याप्रसाद पटेल ने कहा, “मैं भले ही मौके पर नहीं पहुंच पाया, लेकिन मेरा मन और मेरा समर्थन हर पल अपने आदिवासी भाई-बहनों के साथ है। उनकी पीड़ा मेरी पीड़ा है। मैंने लगातार आंदोलनकारियों से बात की है और उनकी हर मांग को गंभीरता से समझा है।”
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि विस्थापितों की समस्याओं का समाधान केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर जल्द से जल्द सुनिश्चित किया जाए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह मुद्दा केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन, उनकी पहचान और उनके अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
पटेल ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि निर्धारित 10 दिनों के भीतर ठोस और संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती है, तो वे स्वयं स्वस्थ होते ही आंदोलन स्थल पर पहुंचेंगे और विस्थापितों के साथ खड़े होकर इस लड़ाई को और मजबूत करेंगे।
उन्होंने अंत में कहा, “यह समय राजनीति का नहीं, बल्कि मानवता का है। जनता जब चिता पर बैठकर अपनी आवाज उठा रही हो, तब जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य है कि वे उनके साथ खड़े हों — और मैं हमेशा उनके साथ हूं।”
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